मैं वो हूं जो अस्तित्व में नहीं है,एक छाया हूं, ज़हर सा बिखरा हूं।

मैं वो हूं जो अस्तित्व में नहीं है,
एक छाया हूं, ज़हर सा बिखरा हूं।

आसमान में घूमती बादलों की तरह,
मेरा रूप छुपा हुआ, अदृश्य सा हूं।

सपनों की दुनिया में विचरण करता,
सीमाएँ तय करता, मैं अनसुना सा हूं।

कभी समुद्र की लहरों की भाषा,
कभी हवा की सुरों में बहुत विचारा हूं।

बीते क्षणों की छाया, सच्चाई की धूप,
मैं वो हूं जो दृष्टिकोण में छुपा हूं।

अस्तित्व का खेल है, इस खोज में,
मैं वो हूं जो अस्तित्व में नहीं हूं।

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