रात का वक्त है और मोहब्बत हसन अपनी प्रेमिका कल्पना के साथ बिस्तर पे प्रेम कर रहा है, प्रेम करने के बाद दोनो सो जाते है।
अब सुबह हो चुकी है मोहब्बत अपनी नींद से जागता है तो देखता है के 9:33 बज रहे है और सपना पहले से ही अपने काम पे जा चुकी है और वो बिलकुल अकेला है तब वो बाथरूम में जाता है और कल रात के हसी पल को याद करता है के पहली बार मोहब्बत और कल्पना का मिलन हुआ और सोचते सोचते हस्तमैथन करता है, हस्तमैथुन करने के बाद वो नहाता है और तैयार हो के जब घर का दरवाजा खोलता है तो ये पाता है के दरवाजा बाहर से लॉक है।
तब वो रूम की खिड़की से बाहर निकलने के लिए खिड़की के पास जाता है और अचानक से ये देख के चौक जाता है के इस रूम में कोई खिड़की ही नहीं है, अब वो सोचने लगता है के ये क्या हो रहा है इस रूम की खिड़की कहा गई कुछ तो गड़बड़ हो रहा है, वो दरवाजा पीटता है, जोर जोर से कल्पना कल्पना चिल्लाता है मगर दूसरी ओर से कोई आवास नहीं आती तब उसे महसूस होता है के ये रूम से बाहर जाने का कोई रास्ता नही है इस कमरे से निकलना मुश्किल है, दो राते गुजर चुकी है और दो रातों में न तो उसे भूख प्यास लगती है और न ही उसे नींद आती है.
मोहब्बत समझ चुका है के वो किसी कुवा के मेढक की तरह अपने घर में हमेशा के लिए फस चुका है और ऐसे ही उसे अब अपनी पूरी जिंदगी जीनी पड़ेगी तभी अचानक से घर के दरवाजे के निचले हिस्से से कोई खाना बढ़ाता है और मोहब्बत खाना खा लो की पुकार लगाता है, ये आवाज सुन के मोहब्बत और भी चौक जाता है क्यों के ये आवाज कलपना की होती है.
मोहब्बत कल्पना कलपना की गुहार लगाता है मगर कल्पना का कोई जवाब नही आता.
कल्पना उसके साथ जरूर कोई घिनौना मजाक कर रही है ये सोच के मोहब्बत मुस्कुराता है और खाना खाता है फिर सो जाता है।
दोबारा जब अपनी नींद से जागता है तो देखता है के 9:36 हो रहे है, जब वो मुड़ के बिस्तर पर देखता है तो पाता है के कल्पना उसके बगल में सो रही है और वो एक सपना देख रहा था.
वो कल्पना को सोते हुए देखता है और बहुत आनंदित होता है, फिर जब कल्पना की आंख खुलती है तो वो मोहब्बत से पूछती है के कल की रात बहुत खास थी, मोहब्बत तभी कल्पना को मुस्कुरा के कहता है के कल की रात एक सपने की तरह थी, मगर मुझे खुशी इस बात की है के ये सपना नहीं बल्के हकीकत है।
आरम्भ एक की समापती
समापति का दूसरा आरम्भ
मोहब्बत का गुलाम
मोहब्बत और कल्पना दोनो तैयार होते हैं और अपने अपने काम पे जाते हैं, मोहब्बत मन ही मन ये सोच के खुशी महसूस करता है के कैसे तो ये एक भयानक सपना था कोई हकीकत नहीं, मोहब्बत को फिल्मों का बड़ा शौक है और क्रिस्टोफर नोलन उसका पसंदीदा अभिनेता है मोहब्बत अक्सर रात में सोने से पहले फिल्मे देखा करता है अगली रात जब कल्पना सो रही होती है तो मोहब्ब्त अपने मोबाइल के स्क्रीन में क्रिस्टोफर नोलन की बनाई फिल्म डंकरिक देख रहा होता है और फिल्म देखते ही देखते वो सो जाता है।
वैसे
मोहब्बत पेशे से एक इंजीनियर है इसका अतीत काफी भयानक यादों से भरा है इसके पिता गुलाम हसन ने अपनी पत्नी हुस्ना बेगम को खाने में ज़हर मिला कर उसके मरने के बाद उसके लाश के साथ संभोग कर के अपने गुप्त अंगों को काट लिया था तब से मुहब्बत का पालन पोषण एक अनाथ आलय में ही हुआ है, मोहब्बत के पापा गुलाम की मानसिक हालत ठीक नहीं थी विष्व युद्ध 2 के दौरान जब गुलाम ने बोलना भी नहीं सीखा था तब गुलाम के अब्बू सिकंदर मोहम्मद जो के ब्रिटिश भारत में रॉयल इंडियन आर्मी सर्विसेज कोर्स (RIASC) में एक सैनिक थे और मई, 1940 में फ्रांस में ब्रिटिश और जर्मन की डंकरिक युद्ध, खुफिया नाम ऑपरेशन डायनेमो में ब्रिटिश की सहायता के लिए अपने गांव राजोहा, पंजाब में अपनी 16 साल की बीवी और इकलौते बच्चे को छोड़ कर फौज के साथ अबुकीर नामक पानी की जहाज से अन्य सैनिकों के साथ फ्रांस पहुंचे जहां युद्ध में दौरान बम फटने की वजह से सिकंदर की मौत हो गई, कहा जाता है के डंकरीक का युद्ध डांटे की कल्पना के जहन्नम की तरह था जहां सिर्फ लाल खून से भरी बस्तियां और सड़के थी वो युद्ध निसंधे जहन्नम की तरह ही था,
जंग का अंत तो केवल मुर्दों ने दिखा है बेचारी सिकंदर की बीवी जोहरा बेगम जब मौत की खबर सुनते ही मानो उसके पैरो तले जमीन निकल जाति है, उसका जीवन एक ऐसी खाई के बीच में फस जाता है जिसके नीचे भी खाई है और ऊपर भी खाई है बीच में 16 साल की जोहरा इस खाई में गिरती चली ही जा रही है।
पैसों की तंगी के कारण जोहरा ब्रिटिश साहब जिन्हे वो माई–बाप कहती थी उनके कैंप में साफ सफाई का काम करने लगती है, साहेब लोग जोहरा के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते थे, जोहरा को साफ सफाई करने के बदले महीने में 16 रूपया मिलता था जो दो लोगो के पालन पोषण और रहने के लिए काफी न था एक आम आदमी के पालन पोषण के लिए लगभग 25 रूपये जरूरी थे तभी कुछ महीनो बाद जोहरा एक दिन कर्नल साहब लोग के पास तनख्वा बढ़ाने की गुहार ले कर अपने बेटे गुलाम के साथ पहुंचती है तब साहब लोग जोहरा को देखते है और पाते हैं के जोहरा कितनी हसीन है जोहरा काधारण सूट सलवार में होती है जिसपे एक काला दुपट्टा होता है उसकी खूबसूरती देख माई बाप कहते हैं के तनख्वाह तो उतनी ही मिलेगी हां मगर तुम अगर बक्शीश चाहती हो तो तुम हमारी और हम तुम्हारी जरूरत पूरी करेंगे,
माई बाप कहते हैं के तुम जवान हो हसीन हो तुम्हे पैसे की भी जरूरत है और शरारिक सुख की भी तुम्हारा दोनो सुख तुम्हारे हम माई बाप पूरा करेंगे और तुम भी हमारी ठरक पूरी करती रहना।
इतना कहते ही एक साहब जोहरा को पीछे से दबोच लेता है और दूसरा साहब जोहरा का दोपट्टा हटाता है फिर एक के बाद एक सभी माई बाप बेचारी जोहरा का बलात्कार करता है, जोहरा चीखती रहती है मगर साहब लोग जोहरा के दर्द से और उत्साहित होते हैं।
11 साहब लोग 17 साल की जोहरा का बलात्कार करते हैं,
जब वोलॉग थक जाते है तो जोहरा को 11 रूपया देते हैं और कहते हैं हर महीने तुम्हे बक्शीश में एक साहब एक रुपैया देंगे तुम बस हफ्ते में एक बार आ कर हमलोग को खुश कर दिया करना, तुम्हारी पति भी नही है जवान हो तुम्हारी पैसों की जरूरत और हमसब की ठरक भी पूरी होती रहेगी।
दर्द से कापती कमजोर जोहरा मजबूरी में वो पैसे उठाती है और अपने फटे कपड़ो पर शॉल लपेट कर अपना बदन ढकती है और गुलाम को गोद में उठा कर अपने घर लौट जाती है।
ये पूरा वाकया मासूम गुलाम के सामने होता है और बिना समझे गुलाम पूरा वाकिया बड़े मज़े से देखता है।
शायद उसे लगता है जैसे एक मां का दूध पीता है वो भी वैसा ही कुछ कर रहे हैं।
जोहरा का घर केवल एक ही रूम का है और वो बाहर आंगन में चूल्हा जलाते हुए अपने नसीब पे रोते है
पेट की भूख और औलाद के पालन पोषण के लिए न चाहते हुए भी अब हर हफ्ते जोहरा गुलाम को गोद में उठा के साहब लोग के पास आती है और अपने कपड़े उतार कर माई बाप की हवस मिटाती है, जब माई बाप जोहरा के बदन से मोहब्बत करते हैं तब ऐसा लगता है जैसे जोहरा मर चुका है उसका शरीर जैसे कोई साधन है जिसमे कोई जान नहीं हो।
हमेशा ये वाक्य गुलाम के आंखों के सामने होता है मगर अब जोहरा अपने बच्चे को रखे भी तो किसके पास रखे इसी लिए वो ये सारा वाक्य गुलाम को देखने देती है
ऐसे ही दिन गुजरते जाते हैं
अब 2 साल बीत चुके है गुलाम साढ़े तीन साल का हो चुका है, जोहरा को पता चलता है के वो गर्भवती है तब जोहरा रवि नदी मे गुलाम के साथ कूद कर आत्म हत्या कर लेती है,
पास के कुछ मछली पकड़ने वाले दौड़ के दोनो की जान बचाने आते है, मगर उनके आते आते जोहरा की मौत हो जाती है मगर गुलाम बच जाता हैं।
गुलाम एक छोटा बच्चा है ये तो दुनिया की बातों से अभी अनजान है, मौत क्या होती है दर्द क्या होता है एक साढ़े तीन साल का बच्चा क्या ही समझ पाएगा
गुलाम अब इन मछली पकड़ने वालो के साथ ही रहता है,
मचवारो ने गुलाम को कभी नही बताया के इसके परिवार वालो के साथ क्या हुआ है,
धीरे धीरे गुलाम बड़ा हो रहा है, इन मचवारी के साथ गुलाम भी मछली पकड़ना सिख जाता है, और कभी रवि तो कभी झीलम तो कभी सुतलेज नदी के पास पजाब के आस पास की पांचों नदियों में मछली पकडा करता है।
मगर बचपन से एक बड़ी अजीब बीमारी गुलाम को कभी भी कहीं भी खुली आंखों से खड़े खड़े ही गुलाम सो जाता है।
एक दिन की बात है जब गुलाम अपनी नाव से यूंही झेलम नदी घूमने जाता है तो वो नदी के बीचों बीच नदी के पानी में अपना चेहरा देख रहा होता है तब देखते ही देखते गुलाम खुली आंखों से सो जाता है फिर जब वो जागता है तब खुद को किसी आलीशान घर में मौजुद पाता है, गुलाम एक बहुत मलमल बिस्तर पे लेटा हुआ है और उस कमरे में बहुत ठंड है तब गुलाम की नजर दीवार पे पड़ी एक घड़ी पे पड़ती है जिसमे 06:39 बज रहे हैं तब वो अपने रूम से बाहर जाने को उठता है और दरवाजे की ओर बढ़ता है तो वो देखता है के इस रूम में कोई दरवाजा या खिड़की नही तब वो दौड़ के बाथरूम में जाता है जिसमे एक आइना होता है, जब गुलाम उस आईने में देखता है तो उसे आइना खाली दिखता है।
आरम्भ का अंत
रचनाकार : कशफ बिन शमीम
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