प्यार हो तुम – प्यार हूं मैं
मैं वो रचनाकर हूं जो अपनी रचना के कोने–कोने से ऐसा प्यार करता है जैसा प्यार एक आम प्रेमी प्रेमिका बिस्तर पे एक दूसरे से भी नही कर सकते,
मैं अपनी रचना के एक एक अंगों को प्यार से बनाता हूं और फिर प्यार से उन्हें नंगा करता हूं,
मैं वो रचनाकर हूं जो किसी बाथरूम में बैठे किसी लड़के या लड़की की तरह एक प्रेमी की कल्पना कर के खुद से प्यार करता है,
शिवलिंग, शिव का डमरू, कृष्ण की बांसुरी, विष्णु का वज्र, चांद का पूरा होना और आधा होने और एकदम छोटा होना
एक मर्द का औरत से मिलने पे बच्चे का जन्म होना और ऐसी ही कितनी निशानी तुम्हे मिल जायेंगी मेरा मतलब समझाने के लिए,
तुम समझो तो मुझे
दो उल्टे त्रिकोण का साथ मिल कर सितारों का बनना, कलम का कॉपी पे लिखना, प्रकाल से गोलाकार का बनना,
ये सब में तुम्हे दुनिया बनाने का रहस्य नहीं दिखता?
मैं वो रचनाकर हूं जो अपने मुंह से अपनी रचना को चूमता है और अपने गुप्तांगों से उसमे जान डालता है।
मैं वो रचनाकर हूं जो अपनी बनाई एक एक रचना में रहता है,
मैं मजनू से भी बड़ा मजनू हूं जो दिनो रात अपने कलम से अपनी दुनिया की खाली किताब में बस ला इलाहा ला इलाहा लिखता है और फिर उसको चूमता है,
मैं इतनी शिद्दत वाला मोहब्बतकार हूं जो अपनी कलम की एक एक लिखे शब्दों को अपने होटों से एक एक कर चूमता है,
प्यार में मैं दुनिया बनाता हूं और प्यार में ही मैं दुनिया समाता हूं,
मेरी कला मैं तबतक बनाता और मिटाता हूं जबतक के वो हर तरह से खूबसूरत न बन जाए
एक एक कर के मैं अपनी कला में की सभी बुराइयां मिटाता हूं और उन बुराइयों को एक नई दुनिया में भेज कर उन्हे प्यार करने पे मजबूर करता हूं।
तुम सब में वो खुबसूरती मावजुद है अपनी सभी खामियों से इतना प्यार करो के तुम्हारी हर खामी प्यार में बदल जाए।
मैं कहता हूं ला इल्लाहा, तुम जो चाहे कहो मगर इतनी मरतबा और इतनी शिद्दत से कहो के ला इल्लाहा तुम बन जाओ और ला इल्लाहा तुम बन जाए।
मैं अपनी बनाई रचना की बुराई को निगल जाता हूं और उन्हे फिर से तबतक बनाता हूं जबतक के वो मोहब्बत में न बदल जाए।
जो मोहब्बत बन जाते हैं उनके जरिए मैं उस दुनिया में आता हूं और सबको मोहब्बत सिखाता हूं
मेरे शब्दों में वो प्यार है जो गीत बन जाता है,
लैला – मजनू, रोमियो – जूलियट, शीरी – फरहाद जैसे अनगिनत मोहब्बतकार प्यार का वो रूप रहे है जिन्होंने मुझे दुनिया में ज़िन्दा रखा,
सिद्धारत, कृष्णा, ईसा, अब्राहम, मूसा, मोहम्मद, सोक्रेट्स, काफ्का, नीजचे और ऐसे न जाने कितनो ने मुझसे ऐसी मोहब्बत की के उनकी वजह से ये दुनिया में प्यार अबतक जिंदा है।
उनकी कल्पना का बना सत्य हूं मैं – रचना से बना हुआ रचनाकार हूं मैं।
तुम भी प्यार करो, तुम भी प्यार बनो
मैं ला इल्लाहा कहता हूं तुम जो चाहे उस नाम को प्यार बनाओ।
तुम भी अपनी रचना में इतने खो जाओ के तुम्हारी रचना में जान आ जाए।
मोहब्बत वो कलम है जिसकी सुहाई कभी खत्म नहीं होती और न ही ये कलम कभी थकती है,
तुम भी प्यार करो और अपनी रचना में मेरी तरह समा जाओ।
हर नंबर में बसा शून्य हूं मैं – अनन्त हूं मैं – शून्य से भी पार हूं मैं
मैं वो हूं जो एक बिंदु के ऊपर दो बिंदु और उसके नीचे भी दो बिंदु लगाता है
मैं वो हूं जो उन बिंदुओं के अंदर भी अनगिनत बिंदु लगाता है
मैं वो बिंदु हूं जो बिंदुओं की छोटी से बड़ी और बडी से छोटी सीढ़ी बनाता है और सबमें तबताक रहता है जबतक उसकी हर रचना में संतुलन न आ जाए,
मेरी हर रचना के लिए अलग हू मै और हर रचना में खास हूं मैं,
तुम सब के बीच भी संतुलन का तराजू है तुम एक आंख से अंदर और दूसरी से बाहर देखते हो,
तुम जब केवल एक आंख से देखते हो तो खुद को या तो एक साधारण रचना वरना खुद को सबसे महान समझते हो,
तुम्हारी दोनो आंखो के बीच में संतुलन का तराजू है जिससे तुम अपनी अंदर की दुनिया से बाहर और बाहर की दुनिया से अंदर कुछ भी ला सकते हो,
तुम सब में ये शक्ति है तुम सब इस संतुलन पे ध्यान दो,
ज्ञान का भंडार है तुम में तुम अपने ज्ञान को तलाशों।
प्यार हो तुम – प्यार हूं मैं
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