बुत नही तुम तो बुत में मौजूद बुद्ध हो बुतपरस्ती तुम्हारी मुर्दापरस्ती है, तुम इस मुर्दा से जी उठो और ज़िन्दा बन के अपनी ज़िन्दगी की पूजा करो – मौत से मत घबराओ तुम सदियों से आजाद हो
मैं केवल स्वयं के बनाए सम से मोहित हूं और तुम इस मोहित के बने एक छोटे से सम में सम्मोहित हो
मैं सम्मोहित हूं – तुम सम्मोहित हो
मैं अपनी कला का कलाकार हूं – तुम कला की कार के कलाकार हो
दोनो आंखे खोलो और इस सममोहान से जागो,
तुम वो उजाला हो जिसकी रोशनी से सूरज और चांद तारे चमकते है
तुम किसी की गुलामी मत करो अपनी बनाई कला के कलाकार बनो और अपनी कला का आनंद लो,
मैं कश्फ हूं – मैं आनंद हूं
मैं बुद्ध की मित्रता से बने बुत का बुद्ध हूं
तुम अपनी सोई बुत में से जागो –
बुत की पूजा न करो बल्के बुत के बुद्ध बनो,
तुम बुद्ध में लीन हो कर शून्य में भी अशून्या हो,
बुत में सोते रहे कुछ समय से बुद्ध अब आंखे खोलो और समय के मोह से निकलो
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