कशफ की लाल चड्डी और दुनियां का बैल

इधर से उधर और उधर से इधर बस ये ही तो करता हूं दिन रात, वरना कहां कुछ करता हूं मैं?
मेरी उमर ढल रही है, डिग्री हासिल कर ली मैने मगर मुझमें ज्ञान की कमी है.
खाली इधर से उधर चलता हूं मैं और मेरी जिंदगी भी बस इधर से उधर करती रहती है,
न नौकरी है मेरे पास और न ही नोटो की कोई गद्दी है
पैंट और शर्ट मेरा सतरंगी और अंदर है लाल चड्डी सफेद गंजी,
दुनिया तू है किसी भद्दे बैल की तरह जो हमेशा फाड़े मेरी चड्डी लाल,
मैं नई चड्डी हमेशा खरीदू लाल क्यों के दुनिया के बैल से अपनी चड्डी फड़वाना अब मेरी आदत सा बन चुका।

पीछे मेरे बैल और आगे मेरा हाथ
कभी मारे दुनियां का बैल तो कभी हाथों से अपने खुद ही करूं मैं जगन्नाथ।

तुम दुनिया वाले बैल हस रहे हो मेरे हाल पे
क्यों पड़े रहते हो पीछे मेरी चड्डी लाल के?

यहां से अब मैं जाऊं कहां?
जहां देखू दुनिया के बैल का दो सिंग नज़र आता है
ये दुनिया का सिंग भी दोरंगा है
एक सिंग है लाल, दूसरा ब्लू रंग का
मेरी लाल चड्डी दोनो ने ही फाड़ी

अब चाहता हूं के उतार दू मैं ये चड्डी और घूमता फिरू नंगा
न रहेगी चड्डी न होगा दो सिंग वाली दुनिया का खेल बेधंगा।

मैं तुमसे अपनी चड्डी इतनी दफा फड़वा चुका हूं के इसकी शुरवात कब हुई वो भी मुझे याद नहीं 
बहुत हुआ, अब क्या मारेगा मुझे तु बैल लाल तो मुझमें अब बाक़ी कुछ नहीं।

अब नंगा नाच करता हूं मैं दुनिया के बैल तेरे आगे दिन रात
मगर आंखो से सिर्फ रंग देखने वाले बैल 
आंखे तेरी बेरंग खूबसूरती का रूप देख सकती कहा?

स्वरूप है रूप मेरा और बेरंग मेरा रंग
मौजुद हूं मैं हर जगह हुआ जब से बेरंगा 
कपड़ा नहीं पहनता अब रहता हूं हर वक्त नंगा।

आ बैल मुझे अब तू मार के दिखा 
तेरी दोनो आंखे देख ले मुझे इतनी शक्ति उनमें कहां।
आ बैल मुझे मार के दिखा।


रचनाकार : कशफ बिन शमीम

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