अगर बोधगया का सारा जिम्मा ngo's और monasteries ही उठाना चाहती हैं तो यहां के हर नागरिक को महीने के 50 हजार रूपए दिया करे।
Ngos की वजह से लोकल टीचर से कोई पढ़ना नहीं चाहता,
लोकल डॉक्टर्स से इलाज नहीं कराना चाहता
और monasteries की वजह से कोई गेस्ट हाउस या लोकल्स के घर पे स्टे नहीं करना चाहता और न ही लोकल भोजनालय में खाना खाना चाहता है।
और तो और लॉकल्स भी नासमझी में आस पास के बजाए online product's मंगवा रहे हैं,
अगर लोकल पैसा लॉकली घूमेगा तो लोकल्स की आमदनी और खुशाली बढ़ेगी,
लोकल मार्केट में पैसे को फैलाने से सरकार और हम सब का मुनाफा होगा।
लोकल बच्चों की देख भाल और क्या पढ़ना है कैसे सोचना है, क्या सही है और क्या गलत है अब ये सीखा रहे हैं इन्हें
प्रजातंत्र को सामान्यवाद का गुलाम बना कर रख दिया है और तो और बाहर से आने वाले पर्यटकों का सारा इंतजाम ये ही करते हैं।
अगर ऐसा चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं होगा जब ज्ञान के भूमि के लोग गुलामी से मोक्ष नहीं पा सकेंगे।
समाज सेवा के नाम पे खुद मोती खाना और हमे दाना खिलाना बंद करो।
तुम भी जियो और हमे भी जीने दो।
कशफ बिन शमीम
पहले ताराडीह से लोगों को हटा कर उन्हे दूर किया
फिर लाल पत्थर पे कब्जा जमाया
फिर पार्क और मैंन रोड को अपने कब्जे में लिया
बोधगया में दो पार्क्स हैं जहां बचपन से मैं बिना कोई पैसे दिए अपने दोस्तों के साथ खेलने जाया करता था
पर अब वहां जाने के लिए बोधगया के नागरिकों को भी पैसे देने पड़ते हैं,
हम हमारे शहर में ही पर्यटक बन कर जी रहे हैं
कभी यहां से नो एंट्री तो कभी वहां से नो एंट्री,
कभी यहां से दुकानें हटाई तो कभी वहां से दुकानें हटाई
आगे पता नहीं कौन कौन से मोहल्ले को खाली कराएंगे और कहेंगे के हमने ऐसा कर के तुमपे उपकार किया है,
बोधगया के लोगों का जीवन बुद्ध की वजह से चलता है
और तुम्हारा जीवन भी बुद्ध से ही चल रहा है
तुम्हे और हमे साथ मिल कर एक दूसरे की मदद करनी चाहिए थी न के हमे अपना गुलाम समझना चाहिए था।
तुमने बहुत पाप किए हैं तुम्हारे कर्मो की सजा तुम्हे अब बुद्ध खुद देंगे
बिहार से प्रजातंत्र और कई धर्मो का जन्म हुआ है
जिसने दुनिया को तहजीब सिखाई तुम उन्हे जाहिल और गवार समझते हो?
मजाक बना कर रख दिया है बुद्ध का और बुद्ध के लोगों का।
कशफ बिन शमीम
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