ध्यान में हर जगह हम ख़ुद ही से ख़ुद की बात कर के वक्त बिताते हैं, वक्त बनाते हैं और वक्त बढ़ाते हैं;
दुनिया में सजदा कर के ख़ुद मिट जाते हैं और ख़ुदा बन जाते हैं
फ़िर
खुदा बन के नई दुनियां बनाते हैं, बढ़ाते हैं
और खुद को दुनियां में समाते हैं;
ख़ुद है ख़ुदा ये भूल जाते हैं,
इसी तरह हर वक्त जानें अनजाने में दुनियां पे चलते हैं, दुनियां को चलाते हैं, और दुनियाओं को गोल गोल घुमाते हैं।
चाहे कहो इसे तुम नमाज़, पूजा या ध्यान...
ये तो अलग तरीके से संतुलन बनाना सिखाते हैं,
हक़ से रूबरू कराते हैं।
ये तुम नहीं समझोगे समझदार जो हो।
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