तुम्हे लगता है के तुम बहुत जानते हो पर क्या तुम सच में कुछ जानते हो?


तुम्हे लगता है के तुम बहुत जानते हो
पर क्या तुम सच में कुछ जानते हो?

तुम्हारे मां–बाप के मिलन से तुमने धरती पे जन्म लिया है,
किसी पंडित या इमाम या तुम्हारे परिवार ने तुम्हारा नाम रखा है,
तुम्हारे परिवार ने तुम्हे चलना सिखाया, धर्म बताया, पालन पोषण किया और किसी सिच्छक से तुम्हे पढ़वाया है।
अपने मोहल्ले और स्कूल के बच्चों ने तुम्हे अपना दोस्त बनाया,
समाज, धर्म, विज्ञान, किताब और सरकार और सिनेमा और समाचार और संगीत ने बचपन से तुम्हे अपनी सोच का गुलाम बनाया है
लिखना, बोलना, पढ़ना, सुनना और समझना सिखाया है
क्या सही है और गलत क्या है,
अच्छाई क्या है बुराई क्या है,
देश क्या है विदेश क्या है,
इन्सान और दूसरे जानवरों में फर्क क्या है, 
भगवान क्या है शैतान क्या है 
अमीरी और गरीबी, 
लड़का और लड़की,
जन्नत क्या है और जहन्नम क्या है

तुम्हे लगता है के तुम बहुत जानते हो पर तुम्हे वहम है के तुम जानते हो,
सत्य तो ये है के तुम दूसरों के इशारे पे कटपुटली की तरह नाचते हो,
तुमने विचार नहीं बनाया बल्के विचारों ने तुम्हे अपना गुलाम बनाया है।
तुम्हे वहम है के तुम जानते हो पर सच में तुम केवल मानते हो, जानते कुछ नही।
तुम समझते रहो के तुम कुछ जानते हो पर मैं जानता हूं के मैं कुछ नहीं जानता। 
क्या विचार समय के बिना मौजूद हो सकता है?
क्या समय बिना विचार के मौजुद हो सकता है?
क्या हमलोग समय और विचार के बिना मौजुद हो सकते हैं?
विचार धारणा बनाता है और धारणा वास्तविकता बनाती है।
हम विचार नहीं बनाते बल्के विचार हमे बनाता है।

कशफ बिन शमीम

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