बिना कुछ किए सब कुछ कर चुका हूं मैं;
अब थक चुका हूं मैं
इक बंद कमरे में रह कर पूरा संसार घूम चुका हूं मैं;
अब थक चुका हूं मैं
वर्तमान में मौजुद हो कर कई दफा भूत और भविष्य का सफर कर चुका हूं मैं; अब थक चूका हूं मैं
हंसा हूं मैं, रोया हूं मैं, चिल्लाया हूं मैं, चुप रहा हूं मैं, प्यार दिखाया है मैने, नाराज हुआ हूं मैं, धोखा भी खाया है मैने, धोखा दिया भी मैने और लोगों के साथ रह कर भी अकेला हूं मैं।
और अब इन तमाम चीजों से बहुत थक चुका हूं मैं
विचारों के क़ैदख़ाने में रह कर भी इस क़ैदख़ाने से निकल चुका हूं मैं
इस संसार के सर्कस से अब थक चुका हूं मैं
संसार के खेल के प्रबंधको के नाटक के कलाकारो की कला से अब थक चुका हूं मैं
अपने चरित्र से बाहर अब निकल चुका हूं मैं
तब भी वक्त के मायाजाल में कुछ समय तक फसा हूं मैं
और अपनी मौजूदगी से थक चुका हूं मैं!
लेखक : कशफ बिन शमीम
स्केच कलाकार : मनोज कुमार पंडित
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