कलम से निकली स्याही

मैं कलम से निकली वो स्याही हूं जो खुद से खुद को लिखता है,
मैं वो स्याही हूं जो इस नापाकी में भी ज़मज़म और गंगा की तरह पाक है।
मेरी शुरवात एक बिंदु के आकार में हुई थी जो आज ज़िन्दा क़िताब है।
कशफ बिन शमीम

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